अध्यापन कौशल

आचार्य तुलसी का अध्यापन कौशल अमर रहेगा: डॉ. धनपत जैन
नैतिकता का शक्तिपीठ में आचार्य तुलसी की मासिक पुण्यतिथि ‘‘आचार्य तुलसी का अध्यापन कौशल’’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित
गंगाशहर।
आचार्य तुलसी के अंग-अंग में आकर्षण था। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। शिष्य के गुणों को पहचानना गुरू तुलसी की कला थी। आचार्यश्री तुलसी की नजर भी बहुत पैनी थी, वह देखते ही अपने शिष्य के रंग-ढंग को पहचान लेते थे। आचार्यश्री तुलसी का अध्यापन कौशल सदैव अमर रहेगा क्योंकि अध्यापक और गुरु कभी नहीं मर सकते। शिक्षा के साथ जीवन व्यवहार न आये तो सब बेकार है आज की शिक्षा इस मूल्यांकन में शून्य है। यह विचार गंगाशहर स्थित नैतिकता का शक्तिपीठ में आचार्य तुलसी की मासिक पुण्यतिथि पर ‘‘आचार्य तुलसी का अध्यापन कौशल’’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी के मुख्य वक्ता डॉ. धनपत जैन ने कही। उन्होंने कहा कि आचार्य तुलसी ने अपने शिष्यों को विद्या-विनय-समता का संदेश देते हुए नैतिक क्रांति, मानसिक शांति और व्यक्तित्व निर्माण की पृष्ठभूमि पर तीन अभियान चलाए - अणुव्रत आन्दोलन, प्रेक्षाध्यान और जीवन विज्ञान। अध्यापक एक चरित्र होता है। एक आचरण होता है। आज के युग में सब कुछ होने के बाद भी शिष्य नहीं हो रहे हैं। शिक्षक ज्ञान के प्रति समर्पित होता है लेकिन आज शिक्षक केवल वेतन के प्रति समर्पित हो रहा है। उन्होंने कहा कि सबसे ज्यादा पवित्र ज्ञान और विद्या ही होते हैं। उन्होंने कहा कि आचार्य तुलसी में आत्मीयता का गुण इतना था कि वे शिष्य के साथ एकात्मक हो जाते थे। वे चाहे कैसी भी परिस्थिति हो शिक्षण कार्य को कभी रूकने नहीं देते थे। आचार्यश्री तुलसी व्याकरण को इतने सरल तरीके से पढ़ाते कि एक बार में ही सब को याद हो जाती। हर बात को इतने रोचक तरीके से समझाते थे। उनकी पढ़ाने की कला बहुत अद्भुत थी। डॉ. जैन ने कहा कि आचार्यश्री तुलसी एक क्रांतिकारी युगपुरुष थे। क्रान्ति के साथ प्रायः विरोध का सह-अस्तित्व देखा जाता है। आचार्यश्री तुलसी के क्रान्तिकारी कदमों के साथ भी विरोधों की एक लंबी श्रृंखला जुड़ी है। उनके जीवन में विरोध और अभिनन्दन दोनों की पराकाष्ठा रही है। एक तरफ उन्हें विश्वव्यापी सम्मान मिला तो विरोध भी कम नहीं मिला। पर वे सम्मान और विरोध दोनों में सदाबहार फूल की भांति एकरूप रहे। आचार्य तुलसी प्रशिक्षण में बहुत श्रम करते थे। आचार्य तुलसी की अनुशासन क्षमता बहुत विशाल थी। हर कार्य अनुशासन के साथ ही करते थे। आज उसी अनुशासन के कारण साधु-साध्वियों को अलग-अलग विषयों का प्रखर वक्ता व लेखक बना दिया है। आचार्य तुलसी ने जो सोचा उसे धरातल पर उतारा और अपनी सोच और विचारों को पुस्तकों में हमेशा के लिए अंकित कर दिया। आचार्यश्री हमेशा प्रेरणा के माध्यम से सभी को शिक्षा का मूल्य बताते रहते थे।
मुनिश्री मणिलाल जी ने अपने जीवन के प्रसंगों की व्याख्या करते हुए कहा कि आचार्य तुलसी के अनुभवों का मेरे पास खजाना है। आप सब ने तो केवल लिखी-लिखाई बातों को पढ़ा है, सुना है, लेकिन मैंने उनके साथ जो पल व्यतीत किये वो बहुत ही अविस्मरणीय है। उनकी प्रत्येक बातें शिखर पर ले जाने वाली है। आचार्य तुलसी तो चमन सितारे थे। जीवन में परिवर्तन लाने के लिए आचार्यश्री कठोर अनुशासन का उपयोग करते थे। मुनिश्री ने कहा कि अगर तुम्हे ज्ञानी बनना है, अध्यात्म को स्वीकार करना है तो शिक्षा के साथ जुड़ा रहना पड़ेगा। हमारा संघ प्रबुद्ध हो, सदैव ऊंचाइयां को छुएं।
विषय प्रवर्तन व स्वागत उद्बोधन देते हुए आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष जैन लूणकरण छाजेड़ ने कहा कि आचार्य पद का दायित्व संभालने के बाद आचार्य श्री तुलसी का ग्यारह वर्ष का समय धर्मसंघ के आन्तरिक निर्माण का समय था। निर्माण की इस श्रृंखला में उन्होंने सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य किया साध्वी समाज में शिक्षा के प्रसार का। आज साध्वी समाज में शिक्षा की दृष्टि से बहुमुखी विकास हुआ है। साध्वी शिक्षा का उपक्रम शुरू होने के कारण ही तेरापंथ की साध्वियों का ज्ञान आज प्रशंसनीय है। इसके एकमात्र श्रेयोभागी हैं-आचार्य श्री तुलसी है।। उन्होंने कहा कि साध्वी प्रमुखा जी ने आचार्य तुलसी वांग्मय का कार्य पूरा कर 108 पुस्तकें केवल गुरुदेव के जीवन पर लिखी है। यह आचार्य तुलसी के अध्यापन का ही प्रभाव रहा। आचार्य तुलसी ने दीक्षा लेने के 5 वर्ष बाद ही शिक्षा देने का कार्य शुरू कर दिया और 15-16 मुनिश्री उनके निर्देशन में पढ़ने लग गये। उनमें से मुनि बुद्धमल जो व्याकरण के प्रकांड पंडित एंव निकाय प्रमुख बने तथा मुनि नथमल जो कि आगे चलकर तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य बने। छाजेड़ ने कहा कि आचार्यश्री तुलसी के जीवन का हर कोण उपलब्धियों से भरा-पूरा प्रतीत होता है। उनके कार्यस्त्रोत विविध दिशागामी हैं। वे एक कुशल अनुशास्ता, समाज-सुधारक, नारी-उद्धारक, धर्मक्रांति के सूत्रधार, मानवता के मसीहा, जैन दर्शन के मर्मज्ञ एवं महान विचारक, चिन्तक व साहित्यकार हैं। उनके साहित्य की भाषा हिन्दी, राजस्थानी और संस्कृत रही है। गद्य और पद्य की विधाओं में उनके द्वारा लिखित पचासों साहित्यक कृतियों से न केवल साहित्य ही समृद्ध हुआ है अपितु दर्शन, ज्ञान-विज्ञान का क्षेत्र कृतकृत्य हुआ है।
मुनिश्री कुशलकुमार जी ने कहा कि शिक्षा हमारे जीवन का मुख्य विषय है। हम संसार में आने के बाद तुरन्त ही शिक्षा का क्रम शुरू हो जाता है। आज शिक्षा का विकास बहुत हो गया है। आज शिक्षा के स्रोत बहुत बढ़ गये है। मुनिश्री ने कहा कि हमारे सामने दो शब्द है ज्ञान और समझ। आज ज्ञान का बहुत विकास हुआ है लेकिन समझ का विकास बहुत कम हुआ है। गुरूदेव तुलसी का कहना था कि ज्ञान का विकास समझ के साथ हो। ज्ञान से अहंकार नहीं बढ़ना चाहिए। हमारी समझ को बढ़ाते रहेंगे तो हमारी गलतियां होनी कम हो जाएगी। मुनिश्री ने कहा कि गुरूदेव तुलसी का अनुशासन कठोर था। मुनिश्री बुद्धमल जी के प्रसंग के माध्यम से समझाया कि अनुशासन अच्छे के लिए होना चाहिए।
कार्यक्रम की विधिवत् शुरूआत मुनिश्री मणिलालजी स्वामी द्वारा नमस्कार महामंत्र के उच्चारण के साथ हुई। मुनि कुशलकुमार जी ने उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को जप करवाया। ज्ञानशाला प्रशिक्षिकाएं रूचि छाजेड़, संजू लालाणी व सरिता आंचलिया द्वारा मंगलाचरण का संगान किया गया। संगोष्ठी के दौरान मुख्य वक्ता डॉ. धनपत जैन का साहित्य व जैन पताका पहनाकर तेरापंथी सभा के मंत्री अमरचन्द सोनी व मुम्बई प्रभारी मांगीलाल छाजेड़ द्वारा सम्मान किया गया। कार्यक्रम के दौरान विमला देवी बुच्चा ने गीतिका का संगान किया। कार्यक्रम के अंत में रतन छलाणी द्वारा आभार ज्ञापित किया गया। कार्यक्रम का सफल संचालन ज्ञानशाला प्रशिक्षिका संजु लालाणी ने किया।