मासिक पुण्यतिथि

अहिंसा पर संयम के लिए मन पर काबू करना होगा: डॉ. यादव

संगोष्ठी में मुनिश्री ने बच्चों को अणुव्रत का सिद्धांत ‘‘मैं हिंसात्मक एवं तोड़फोड़ मूलक प्रवृत्तियों में भाग नहीं लूंगा’’ का संकल्प करवाया
आचार्य तुलसी की मासिक पुण्यतिथि पर ‘‘आचार्य श्री महाप्रज्ञ और अहिंसा’’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित
गंगाशहर। जैन धर्म के अलावा ऐसा कोई धर्म नहीं है जिसमें अहिंसा के बारे में अति सूक्ष्म से व्याख्या की गई हो। हम सभी जानते हैं कि अनेक धर्मों में अनेक विवाद हुए परन्तु जैन धर्म में आजतक हमने विवाद नहीं सुना। हमें एक-एक इन्द्रियों को अच्छे से देखने का प्रयास करना चाहिए। यह विचार आचार्य तुलसी की मासिक पुण्यतिथि पर ‘‘आचार्य महाप्रज्ञ और अहिंसा’’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी के मुख्य वक्ता पूर्व विकास अधिकारी डॉ. मनमोहन यादव ने कही। उन्होंने कहा कि आचार्य महाप्रज्ञजी के साहित्य को पूरे विश्व में पढ़ा जाता है। जैन धर्म के जितने भी तीर्थंकर हुए या आचार्य हुए सभी ने अहिंसा का मार्ग अपनाने व राग-द्वेष से मुक्त होने की प्रेरणा दी। मन भी घोड़े के समान होता है। इसको काबू में करने के लिए संयम की लगाम रखनी होगी। उन्होंने हिंसा के चार प्रकारों का उल्लेख करते हुए हिंसा से बचने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि हमें हिंसा के बारे में जानकारी होगी तभी हम अहिंसा के मार्ग पर चल सकते हैं।
आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष जैन लूणकरण छाजेड़ ने कहा कि अहिंसा की सूक्ष्म व्याख्या भगवान महावीर के काल से चली आ रही है। परन्तु आचार्यश्री महाप्रज्ञ व आचार्य श्री महाश्रमण जी ने किसी के प्रति गलत भाव भी आना भी एक प्रकार की हिंसा बताई है। उन्होंने कहा कि आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान इतना बड़ा संस्थान होने के साथ ही लोकिक सेवा प्रदान करने वाला संस्थान है। इसी को मद्देनजर संस्थान की एक वेबसाईट का निर्माण करवाया गया है। इससे संस्थान की सभी गतिविधियों के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी मिल सकेगी।
संगोष्ठी के दौरान आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान की वेबसाईट का लोकार्पण मुनिश्री द्वारा नमस्कार महामंत्र सुनाकर किया। इसके बाद आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान के सभी पदाधिकारी व कार्यकर्ताओं द्वारा बटन दबाकर वेबसाईट का लोकार्पण किया। तत्पश्चात वेबसाईट के बारे में सभी को जानकारी दी गई।
स्वामी विवेकानन्द कॉलेज के प्राचार्य विजय आचार्य ने कहा कि हमारी संस्था अणुव्रत से जुड़ी हुई है। हमारे नये बच्चों को आचार्य तुलसी समाधि स्थल के दर्शन करने का सौभाग्य मिला, यह अविस्मरणीय है। आचार्य तुलसी के अणुव्रतों के नियम के बारे में विस्तारपूर्वक बताया। मन, वचन, काय से होने वाले हिंसा को रोकने का प्रयास करना चाहिए। जैन धर्म में प्रत्येक आत्मा को परमात्मा बनने का अधिकार है। मानव मात्र का कल्याण ही जैन धर्म का मूल उद्देश्य है। हिंसा का विचार भी नहीं आना चाहिए। हिंसा को रोकना है तो हमें संयम के रास्ते पर अग्रसर होना होगा।
शासनश्री मुनिश्री मणिलाल जी ने कहा कि धरती से ही स्वर्ग बना है। मनुष्य जीवन बहुत दुर्लभ होता है। 84 लाख योनियों के भ्रमण के बाद हमें मनुष्य जीवन मिलता है। यदि इसका सम्यक उपयोग नहीं किया तो फिर इस 84 लाख योनियों का भ्रमण करना निश्चित ही है। मुनिश्री ने अणुव्रत के सिद्धान्तों के माध्यम से विद्यार्थियों को हिंसा से बचने की प्रेरणा दी तथा बताया कि भारत से सारा संसार शिक्षा ग्रहण करता था। भारत हमेशा विश्व गुरु कहलाया है। आचार्य भिक्षु जैसा महान् योगी हो और महावीर जैसे भगवान हो तो धरती भी स्वर्ग बन सकती है। उन्होंने छात्र-छात्राओं को तोड़-फोड़ नहीं करने का संकल्प दिलाकर अहिंसा के मार्ग पर चलने का मार्गदर्शन दिया।
मुनिश्री शान्तिकुमार जी ने कहा कि जो पांच महाव्रत, तीन समिति और तीन गुप्ति साधु जीवन के लिए अहिंसा के सूत्र है। महाप्रज्ञ जी करूणा के सागर थे। करूणा तभी आती है जब मन में दया और अहिंसा का भाव हो। हम महाप्रज्ञ जी के कथाओं को पढ़ने से जीवन निर्माण में काफी सहायता मिलेगी। महाप्रज्ञ जी के सिद्धान्तों को अगर हम अपने जीवन उतारें तो हम अच्छे इंसान बन सकते है। वे हमेशा अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते थे।
मुनिश्री कुशलकुमार जी ने कहा कि जैन धर्म अहिंसा के विषय में बड़े ही गहराई में उतरा है। दूसरों के बीच में बोलना भी हिंसा है। हें व्यवहारिक व खान-पान की हिंसा से बचने का प्रयास करना चाहिए। मुनिश्री ने कहा कि मोबाइल में गेम खेलते समय मार-काट करना भी एक प्रकार की हिंसा है। हमें अपने पूरे जीवन में मांसाहार व अंड़ों के सेवन नहीं करना चाहिए। मन में माफ करने की भावना को जाग्रत करना होगा तभी हम हिंसा पर संयम बना पाएंगे। मुनिश्री ने एक रोचक कहानी के माध्यम से अहिंसा के विषय में बताया।
संगोष्ठी की शुरूआत भंवरलाल डाकलिया ने मंगलाचरण से किया। इसके बाद तेरापंथ प्रोफेसनल फोर्म के अध्यक्ष बच्छराज कोठारी ने मुख्य वक्ता डॉ. मनमोहन यादव का परिचय देते हुए स्वागत भाषण दिया। संस्था के पदाधिकारियों द्वारा मुख्यवक्ता डॉ. मनमोहन यादव व अतिथि विजय आचार्य का जैन पताका, स्मृति चिन्ह व साहित्य भेट कर सम्मानित डॉ. पीसी तातेड़, अमरचन्द सोनी, मनोहर लाल नाहटा, ममता रांका, पवन छाजेड़, नारायण चन्द गुलगुलिया, जीवराज सामसुखा अनिल सेठिया, व जतन संचेती किया गया। वेबसाईट का निर्माण करने के लिए सुरेश पारीक को भी सम्मानित किया गया। संचालन तेयुप मंत्री देवेन्द्र डागा ने किया।

प्रेषक
    जैन लूणकरण छाजेड़
अध्यक्ष