महाप्रज्ञ व सहिष्णुता

सहिष्णुता से घर स्वर्ग बन सकता है: डाॅ. शुक्लाबाला पुरोहित

सहिष्णुता से घर स्वर्ग बन सकता है: डाॅ. शुक्लाबाला पुरोहित
आचार्यश्री तुलसी की मासिक पुण्यतिथि पर ‘‘महाप्रज्ञ एवं सहिष्णुता’’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित
गंगाशहर। जैन दर्शन आज की परिस्थितियों में विश्व को नई दिशा देने में सक्षम है। आचार्य महाप्रज्ञ जी के साहित्य से एक शब्द भी जीवन में उतार लें तो हमारा जीवन ही बदल जाएगा। आचार्य महाप्रज्ञ जी के संदेशों को जन-जन तक पहंुचाने में आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह विचार नैतिकता का शक्तिपीठ में आचार्यश्री तुलसी कि मासिक पुण्यतिथि पर ‘‘महाप्रज्ञ एवं सहिष्णुता’’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी के मुख्य वक्ता पूर्व प्राचार्य डाॅ. शुक्लाबाला पुरोहित ने व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि सन् 1972 से जैन समाज से जुड़ी हुुई हूं। हमारा जीवन बहुत छोटा है हमारे पास लड़ाई करने का समय नहीं है बल्कि आपसी तालमेल के साथ आनंदपूर्वक जीवन जीना चाहिए। आज भी जैन समाज के बालक अलग से पहचाने जा सकते हैं क्योंकि जैन समाज के महान संतों व साध्वियों ने उनको आदर्शों व संस्कारों का पाठ पढ़ाया है। गुरूओं की कृपा से जैन समाज के बच्चों में संस्कारों का बीजारोपण बचपन से ही हो जाता है। उन्होंने कहा कि टीबी और कैंसर से अधिक खतरनाक बीमारी मोबाइल, टेलिविजन हो गया है। हमें अपने बच्चों को इनसे बचाना चाहिए। डाॅ. शुक्लाबाला ने कहा कि ऐसी संगोष्ठियों में छोटे बच्चों और विद्यार्थियों को भी जोड़ना चाहिए। आज परिवारों में लड़ाइयां बढ़ती जा रही है जिसका मुख्य कारण असहिष्णुता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं तथा परिवार के सभी जनों को सहिष्णुता बढ़ाने के लिए प्रयास करना चाहिए। इससे घर को स्वर्ग बना सकते हैं। आज देश में संयम नहीं होने के कारण परिवारों में लड़ाई हो रही है, हमें संयुक्त परिवार को बढ़ावा देना चाहिए। समाज सुधारने के लिए हम सभी को कुछ कदम उठाने के प्रयास करने होंगे। उन्होनंे कहा कि आचार्यश्री महाप्रज्ञ की बातों को जीवन में उतार कर उनके आदर्शों के मार्ग पर चलना होगा। पंच महाव्रतों सत्य, अहिंसा, अचैर्य, अपरिग्रह व ब्रह्मचर्य के संदेश को सरल भाषा में जनता के समक्ष रखते हुए कहा कि इनकी पालना करने से जीवन में बदलाव लाया जा सकता है। 
शासनश्री मुनिश्री मणिलाल जी स्वामी ने कहा कि इस संसार में दो प्रकार के सुख होते हैं पहला आध्यात्मिक व दूसरा सांसारिक। सांसारिक सुख क्षणिक होता है लेकिन आध्यात्मिक सुख शास्वत सुख होता है। मुनिश्री ने आचार्य महाप्रज्ञ जी के जीवन प्रसंगों के माध्यम से उनके करूणा भावों का सहिष्णुताओं का उल्लेख किया। संयम-तपस्या-त्याग-सहिष्णुता आदि भाव मानव को मोक्ष मार्ग की ओर ले जाता है। हमें आचार्य महाप्रज्ञ जी के संदेशों से जीवन में सहिष्णुता बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। 
संगोष्ठी के दौरान विषय प्रवर्तन करते हुए आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष जैन लूणकरण छाजेड़ ने कहा कि सहिष्णुता का तात्पर्य है सहन करना। प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न कुछ सहन करना पड़ता है अर्थात् वह सहिष्णु है परन्तु असहिष्णुता परिवार, समाज व देश में जो बढ़ रही है जिसका परिणाम झगड़े, विवाद एवं युद्ध होते हैं। छाजेड़ ने कहा कि आचार्य तुलसी द्वारा प्रतिपादित अणुव्रत आन्दोलन का पांचवा सूत्र है ‘मैं धार्मिक सहिष्णुता बनाये रखूंगा’ आचार्य महाप्रज्ञ स्वयं सहिष्णु थे इसलिए उन्हें करूणासागर कहा जाता था तथा आचार्य महाश्रमण सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति हैं। जिनके जीवन से सहिष्णुता की प्रेरणा मिलती है।
मुनिश्री कुशलकुमार जी ने आचार्य महाप्रज्ञ जी के सहिष्णुता के पांचों मंत्रों के माध्यम से बताया कि साधु को हर चीज का अभ्यास रखना चाहिए। हमें सभी परिस्थितियों में सम रहने का पाठ पढ़ाया गया है। साधु बनने के बाद स्थितियां बहुत बदल जाती है। साधु को संयम की नौका में ही रहना होगा। उन्होंने कहा कि संसार में जीना है तो बहुत कुछ सहन करना व कड़वाहट का जहर पीना पड़ता है। अपने आप को सहन करना सीख लें तो यह भी बहुत बड़ी कामयाबी होगी। उन्होंने मुनिश्री मणिलाल जी के जीवन प्रसंग से सहनशील बनने की प्रेरणा दी। आचार्य तुलसी ने कहा कि हमें कितना सहन करना पड़ता है वो हम ही जानते हैं। आचार्य तुलसी कहा करते थे कि अपने जीवन में जितने उतार चढ़ाव देखे, उन्होंने जितना लोगों के कटाक्ष सुनने पडे़, उसका अंश मात्र भी सहन करना सीख लें तो जीवन में सारे दुःखों का नाश हो जाए। मुनिश्री ने कहा कि सहन करने की कला हमें आचार्य भिक्षु से विरासत में मिली है, धर्म इंसान को सहन करने की अद्वितीय शक्ति प्रदान करता है। 
संगोष्ठी के दौरान संस्थान के अध्यक्ष जैन लूणकरण छाजेड़, तेरापंथ सभा के कोषाध्यक्ष भैंरूदान सेठिया, जीवराज सामसुखा व जतन संचेती ने बैगलूरू के ज्ञानगढ़ से आए मुमुक्षु राहुल बोहरा पुत्र दिलीप बोहरा का जैन पताका, स्मृति चिन्ह, साहित्य भेंट कर सम्मानित किया। मुख्य अतिथि पूर्व प्राचार्य डाॅ. शुक्ला बाला पुरोहित को डाॅ. पी.सी. तातेड़, मधु छाजेड़ ने सम्मानित किया। संगोष्ठी में मनोज छाजेड़ ने गीतिका का संगान किया। मुख्य अतिथि का परिचय डाॅ. मनोज जैन ने दिया। कार्यक्रम का संचालन मनोज सेठिया ने किया।


                                            प्रेषक
                                        जैन लूणकरण छाजेड़
                                            अध्यक्ष