‘‘महान संत तुलसी’’

आचार्य तुलसी का 106वां जन्मोत्सव पर ‘‘सदी के महान संत तुलसी’’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित

आचार्य तुलसी का 106वां जन्मोत्सव पर ‘‘सदी के महान संत तुलसी’’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित
गंगाशहर। भारत की धरती पर जितने महापुरुष हुए हैं उनका मुख्य उद्देश्य करूणा होता है। आचार्य तुलसी भी करूणाप्रधान थे। वो चाहते थे कि हर प्राणी सुखी रहे। यह विचार गंगाशहर स्थित नैतिकता का शक्तिपीठ पर ‘सदी के महान संत तुलसी‘ विषय पर आयोजित संगोष्ठी के मुख्य वक्ता डॉ. मनीषा श्रीमाली ने व्यक्त किए। उन्होंने अणुव्रत की व्याख्या करते हुए कहा कि अणुव्रत सम्प्रदाय मुक्त धर्म है, मानव धर्म है, उपासना व आराधना का माध्यम है। इसी के साथ अणुव्रत धर्म में नैतिकता, प्रामाणिकता मुख्य है। डॉ. श्रीमाली ने कहा कि भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन ने अपनी पुस्तक ‘‘लिविंग वीथ प्रपज’’ एक पुस्तक लिखी जिसमें विश्व की 13 महान् विभूतियों के व्यक्तित्व के बारे में लिखा उसमें एक आचार्य तुलसी थे। इसी तरह उस समय के राष्ट्रपति वी.वी. गिरि ने आचार्य तुलसी को ‘युग प्रधान’ के अलंकरण से सम्मानित किया था। अतः आचार्य तुलसी को जैनाचार्य की जगह जन आचार्य कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। उन्होंने कहा कि अतुलनीय एवं विलक्षण व्यक्तित्व के धनी आचार्य तुलसी ने 61 वर्षों तक विशाल धर्मसंघ का दायित्व संभाला। उन्होंने कहा मानवीय एकता, व्यवहारिकता सही मानदण्ड का विकास अणुव्रत का उद्देश्य है। आचार्य तुलसी ने अणुव्रत के 11 नियमों के माध्यम से देश में परिवर्तन की लहर चलाई। अणुव्रत के साथ प्रेक्षाध्यान-जीवन विज्ञान की भी अलख जगाकर जन-जन तक पहंुचाई। उन्होंने कहा कि आचार्य तुलसी ने सामाजिक कुरूतियों को दूर करने में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। आचार्य तुलसी ने पंजाब की समस्या का हल निकालने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास करते हुए राजीव-लौंगेवाला समझौता करवाया। इसी के साथ संसद का गतिरोध भी दूर करवाया। उन्होंने कहा कि आचार्य तुलसी ने अपने पूरे जीवनकाल में सामाजिक एवं राष्ट्रीय अनेक समस्याओं का हल निकालने का भरसक प्रयास किया। आचार्य तुलसी का व्यक्तित्व इतना विशाल है कि उनको शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। आचार्य तुलसी का अपने शिष्य को गुरूता सौंपना अद्भुत निर्णय था। डॉ. श्रीमाली ने कहा कि नैतिकता का शक्तिपीठ परिसर में ध्यान करके अपने कषायों को शांत कर सकते हैं। यहां एक अलौकिक शक्ति का संचरण होता है।
संगोष्ठी के दौरान विषय प्रवर्तन करते हुए अध्यक्ष जैन लूणकरण छाजेड़ ने कहा कि उस महान, विशाल व्यक्तित्व को हम किसी उपमा में उपमित नहीं कर सकते। जीवन में गुरू की महत्ती आवश्यकता होती है लेकिन जिन्हें आचार्यश्री तुलसी जैसा गुरू मिल जाए उन्हें मुक्ति मिल जाती है। मनुष्य को हमेशा अपने जीवन में गुरू के विचारों, सिद्धान्तों व आचरणों को स्वीकार क्षितिज पर भारतीय एवं जैन संस्कृति को पहंुचाया।
शासनश्री मुनिश्री मणिलाल जी स्वामी ने कहा कि आचार्य तुलसी एक ऐसे आचार्य थे जो संघ का हर तरह से विकास करना चाहते थे। भगवान से भी बड़ा गुरु होता है। हर कोई बड़ा नहीं बन सकता। बड़ा बनने के लिए बहुत तपना पड़ता है। बड़ा बनने के लिए बहुत कुछ सहन करना पड़ता है। मुनिश्री ने कहा कि मैंने आचार्य तुलसी के पास 25 वर्ष तक रहकर वात्सल्य प्राप्त किया है। मुनिश्री ने गुरूदेव के जीवन प्रसंगों के कुछ यादगार उदाहरण देकर अपनी भावनाएं रखी।
मुनिश्री सुमतिकुमार जी ने आचार्य तुलसी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जैन धर्म को जन धर्म बनाने की कला आचार्य तुलसी में थी। तेरापंथ धर्मसंघ को विश्व क्षितिज पर स्थान दिलवाया। आचार्य तुलसी ने 1 लाख किलोमीटर से अधिक की पदयात्रा करके मानव मात्र के कल्याण और कर्मोंबन्ध से मुक्ति का मार्ग बताते हुए मोक्ष का मार्ग बताया। इंसान को इंसान बनने के लिए आचार्य तुलसी ने प्रेरणा दी। आचार्य तुलसी हमेशा कहते थे कि ‘‘पहले इंसान बनो, फिर हिन्दू या मुसलमान‘‘। मुनिश्री ने कहा कि आचार्य तुलसी का सम्पूर्ण जीवन प्रेरणादायी था। आचार्य तुलसी साधना व संयम के प्रति जागरूक थे। वे सिद्ध पुरूष कहलाये।
मुनिश्री आदित्य कुमार जी ने कहा कि आचार्य तुलसी के व्यक्तित्व को किसी भी विधा में व्यक्त किया जा सकता है। कोई भी व्यक्ति उनका आंख मूंदकर अनुसरण कर सकता है। तुलसी के जैसा बनने का प्रयास करें तभी जन्मदिन मनाने की सार्थकता होगी। मुनिश्री ने कहा कि आचार्य तुलसी का व्यक्तित्व बहुत विस्तृत था। उन्होंने अपना जीवन सार्थक किया। उन्होंने अपने जीवन को इतना महान बनाया कि कोई भी व्यक्ति उनके जीवन का अनुकरण करके अपने जीवन को पवित्र बना सकते हैं। मुनिश्री ने ‘‘तलाशा जहां-जहां है, खोजते नयन कहा है’’ गीतिका के माध्यम से भावपूर्ण प्रस्तुति दी।
मुनिश्री कुशलकुमार जी ने कहा कि आचार्य तुलसी ने बाल्यकाल में अपनी मां से पूछा कि आचार्य कालूगणी के बाद कौन आचार्य बनेगा। माता वदना जी ने आंख दिखाते हुए बोला कि ऐसी बात नहीं करते। मां की आंख एक ऐसी आंख होती है जो बच्चों को जीवन निर्माण मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आचार्य तुलसी के जीवन निर्माण में मां वदना जी का अतुलीय योगदान रहा। आचार्य तुलसी का बचपन ज्यादातर अध्ययन में ही व्यतीत होता था। मुनिश्री ने कहा कि कठिन को सरल कर दे वो ही मंत्री मुनि बनते हैं। मुनिश्री ने आचार्य कालूगणी द्वारा आचार्य तुलसी को दायित्व सौंपने का प्रसंग रोचक ढंग से बताते हुए उनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर प्रकाश डाला। आचार्य कालूगणी ने अपने हाथ से उत्तराधिकारी पत्र स्वयं ने लिखा जो परम्परा बन गई।
तेरापंथी सभा, गंगाशहर के मंत्री अमरचन्द सोनी ने आभार ज्ञापित करते हुए कहा कि आचार्य तुलसी हमेशा कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहन देते थे। आज भी आचार्य तुलसी की आलौकिक प्रेरणा सक्रिय है।
कार्यक्रम का शुभारम्भ मुनिवृन्द ने नवकार महामंत्र के साथ किया। संगोष्ठी के दौरान मुख्य वक्ता डॉ. मनीषा श्रीमाली का तेमम अध्यक्ष ममता रांका, मंत्री कविता चौपड़ा, मधु छाजेड़, मंजू आचंलिया, सुमन छाजेड़ ने जैन पताका, साहित्य व स्मृति चिन्ह देकर सम्मान किया। कार्यक्रम में मंगलाचरण तेेरापंथ मंहिला मण्डल व कन्या मंडल ने ‘‘अतुलनीय कर्तृव्य तुम्हारा, तुच्छ लगे सभी तुलनाएं’’ गीतिका गा कर किया। तेयुप मंत्री देवेन्द्र डागा ने ‘‘धरती पर कभी-कभी महामानव आते हैं’’ गीतिका का संगान किया। कन्या मंडल संयोजिका गरिमा सेठिया ने ‘‘वो तपो मूर्ति, हे युग-नायक’’ गीतिका का संगान किया। कार्यक्रम का सफल संचालन संतोष बोथरा ने किया।

प्रेषक
जैन लूणकरण छाजेड़
अध्यक्ष

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