संस्था के बारे में

आचार्य तुलसी का महाप्रयाण 23 जून 1997 आषाढ़ कृष्णा तृतीया वि.सं. 2054 को हुआ। आचार्य तुलसी के महाप्रयाण के बाद उनके अन्तिम संस्कार स्थल पर आचार्यश्री महाप्रज्ञ के पावन सान्निध्य में स्मारक हेतु षिलान्यास किया गया। श्रद्धेय आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी ने इसी परिसर का नामकरण नैतिकता का शक्तिपीठ किया, जो आज इस रूप में प्रतिष्ठित है। आचार्य तुलसी का समाधि स्थल उनके द्वारा प्रदत्त नैतिक मूल्यों के विकास प्रचार-प्रसार एवं संस्कारो के जागरण की प्रेरणा देता है। इस शक्तिपीठ की स्थापत्य कला अपनी वैशिष्ट्यता लिए हुए है। यह समाधि स्थल श्रद्धालुओं के लिए उपासना और ध्यान-साधना की उपयुक्त तप:स्थली है। आचार्य तुलसी की अन्तिम संस्कार स्थली पर निर्मित इस समाधि स्थल का लोकार्पण 1 सितम्बर 2000 को हुआ। समाधि स्थल परिसर में 30 हजार वर्गफुट के निर्माणकार्य अंतर्गत तीन प्रशालें एवं नौ कमरे अवस्थित हैं। समाधि स्थल परिसर के मध्य 3 हजार वर्गफुट के गोल घेरे में मूल समाधि अवस्थित है। इसके शिखर पर चारों दिशाओं में लगे संगमरमर पर आचार्य तुलसी के विभिन्न मुद्राओं में रेखाचित्र उनकी स्मृति को मुखर कर रहे हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि समाधि स्थल की अन्तस्थ भूमि में एक अस्थि-कलश स्थापित है। यह अस्थि-कलश अष्ट धातुओं एवं बहुमूल्य रत्नों की नक्काशी से युक्त सिद्धहस्त शिल्पियों द्वारा निर्मित किया गया है। इनसे जुड़ी दर्शक दीर्घाएं भी विस्तृत है। इस पवित्र प्रांगण में भव्य एवं आकर्षक आर्ट गैलरी बनाई गई है। जिसमें आचार्य तुलसी के पूरे जीवन की स्मृतियों को चित्रित किया गया है। यह तुलसी चित्रदीर्घा निश्चय ही दृष्टव्य है। समाधि स्थल में संलग्न एक विशाल अणुव्रत मंच है जो आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के वृह्द आयोजनों के लिए बहुपयोगी है। यह ओपन थिएटर हृदय की विशालता व खुले विचारों की उदारता का परिचायक है। नैतिकता का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के लिए इस मंच का सार्वजनिक उपयोग किया जाता है। ‘नैतिकता का शक्तिपीठ’ को बाहरी आकर्षण एवं सुरम्यता प्रदान करने के लिए परिसर की सीमा में भव्य विशाल उद्यान भी लगाया गया है। यह उद्यान इस क्षेत्र का रमणीय व दर्शनीय उद्यान है। विभिन्न तरह के रंग बिरंगे फूलों व पेड़ों की शीतल छाया के साथ ही इस रमणीक उद्यान को जिस भव्य तरीके से सुसज्जित किया गया है, वह आकर्षक है। श्रद्धालुओं के साथ ही सुबह-शाम भ्रमण हेतु भी बड़ी संख्या में लोग इस उद्यान में आकर स्वास्थ्य लाभ व सुकून महसूस करते है। पक्षियों का गूंजता हुआ कलरव हो या फिर हो पत्तों की सरसराहट, सूरज की किरणों का स्पर्श या जागते फूल हो या टहनियों की हथेली को छेदकर खिलते पत्तों की आहट। अंधकारमय परतों के अंदर अनगिनत बीजों ने ’तमसो मा ज्योतिर्गमय’ कहा और अनंत चैतन्य की सृष्टि समाधि के चारों ओर हो गई। मानो आचार्य तुलसी की अव्यक्त ऊर्जा सारे वातावरण को संचेतन कर रही है। सचमुच कितना जादुई है यह सब। आएं बैठें, घूमें और महसूस करें उस चैतन्य सत्ता को जो अनवरत चल रही जप, ध्यान एवं अध्यात्म की तंरगों से पुष्पित, पल्लवित हो रही है। यहां सिर्फ तन और मन ही नहीं, आत्मा तक तरंगित हो उठती है। नैतिकता का शक्तिपीठ की स्थापत्य कला के बाहरी परिवेश को देखने एवं नैतिकता के महान् सम्बोधन का श्रद्धा से स्मरण एवं आत्मशान्ति प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में विभिन्न धर्मों के श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों का आगमन निरन्तर जारी रहता है। आने वाले आगन्तुक यहां की भौगोलिक रमणीयता व आचार्य तुलसी के चित्रों एवं चिरस्मरणीय भावमुद्राओं को अन्त:स्थल में ग्रहण करते हैं। उनके आत्म-कल्याणकारी आध्यात्मिक संदेशों, नैतिक मूल्यों एवं सामाजिक आयामों की प्रेरणाओं को अंतर्मन में आत्मसात् करते हैं। आचार्य तुलसी की स्मृतियों को चिरस्थायी रखने उनके कल्याणकारी कार्यों एवं अवदानों को प्रचारित प्रसारित करते हुए नैतिकता के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान का गठन किया गया। आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान के सदस्य सम्पूर्ण भारत एवं पड़ोसी देशों में भी है। प्रतिष्ठान आचार्य तुलसी के जीवन, विचार, कला, दर्शन, साहित्य व विधाओं पर शोध एवं तुलसी के व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व को अजर-अमर बनाने के लिए आचार्य तुलसी राजस्थानी साहित्य शोध संस्थान, पुस्तकालय एवं वाचनालय, आचार्य तुलसी साहित्य केन्द्र आदि अनेक महत्वपूर्ण आयाम संचालित किये जा रहे हैं। प्रतिष्ठान द्वारा शक्तिपीठ के ठीक सामने आशीर्वाद अतिथिगृह का भी निर्माण करवाया गया है। इस चार मंजिला भवन में कमरे, डॉरमेटरी, सुसज्जित हॉल, सत्कार पाकशाला सहित सभी सुविधाजनक व्यवस्थाएं उपलब्ध है। यह भवन आध्यात्मिक सामाजिक आयोजनों एवं यात्रियों के लिए बहुत उपयोगी है। यहां पधारने वाले यात्रियों के लिए भोजनशाला की भी नियमित व्यवस्था रहती है। अनेक श्रद्धालु प्रतिवर्ष दर्शनार्थ पधारते है। उनके लिए यहां सभी अनुकूल सुविधाएं उपलब्ध रहती है। सभी से अनुरोध है कि वर्ष में कम से कम एक बार सपरिवार मित्रों एंव परिजनों सहित यहां पधारनें का क्रम बनायें। निश्चय ही आपको यहां से प्राप्त आध्यात्मिक विकिरणों से शारीरिक, मानसिक एवं आत्म-कल्याणकारी विकास की अनुभूति होगी। आचार्य तुलसी की पावन स्मृति में बीकानेर जिले के सबसे बड़े अस्पताल पीबीएम में प्रतिष्ठान के सहयोग से निर्मित आचार्य तुलसी रीजनल कैंसर चिकित्सा एव अनुसंधान केन्द्र में नित्य सैकड़ों कैंसर रोगियों को शारीरिक स्वास्थ्य लाभ के साथ ही उन्हें जीवनमूल्यों की प्रेरणा व प्रेक्षा ध्यान के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य लाभ भी मिलता है। इस कैंसर सेंटर में कोबाल्ट कक्ष, पेलिएटिव यूनिट, प्रेक्षा कॉटेज आदि का निर्माण भी करवाया गया है। आचार्य महाप्रज्ञ जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में बोनमेरो ट्रान्सप्लांट सेन्टर का निर्माण करवाकर लोकार्पित कर दिया गया है। आचार्य तुलसी समाधि स्थल के अलावा गंगाशहर में आचार्य तुलसी के निर्वाण स्थल तेरापंथ भवन, गंगाशहर में जिस कमरे व पट्ट पर अंतिम श्वास ली, उसको दर्शनीय बनाया गया है। यहां आचार्य श्री के चित्र व संदेशों के साथ ही आचार्य तुलसी स्वास्थ्य निकेतन एवं आचार्य तुलसी कम्प्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र के माध्यम से हजारों लोग प्रतिवर्ष लाभान्वित होते है। तेरापंथ भवन से कुछ दूरी पर ’बोथरा भवन’ स्थित है, जहां आचार्य श्री तुलसी ने अपने जीवन काल की अंतिम रात्रि व्यतीत की थी, इस भवन को आचार्य तुलसी की स्मृति में फोटो गैलरी के रूप में परिवर्तित किया गया है। सभी धर्मों के साधु संतों के समय समय पर होने वाले सामान्य समागम से जहां गंगाशहर अपनी आध्यात्मिकता के कारण विख्यात है वहीं आचार्य तुलसी की पुण्यभूमि के गौरव एवं उनकी स्मृति में बने नैतिकता का शक्तिपीठ की स्थापना से इस क्षेत्र की ख्याति में एक नया आयाम जुड़ गया है।